अलाउद्दीन खिलजी – 5 most important Questiones

 Q1. अलाउद्दीन खिलजी की बाजार नीति का परीक्षण करें।

 अथवा Q. अलाउद्दीन खिलजी की बाजार नियंत्रण नीति का वर्णन करें।

Ans- परिचय:अलाउद्दीन खिलजी भारत के सल्तनतकार थे और उनकी शासनकाल 1296 से 1316 तक चला। उनकी बाजार नीति उनके राज्य की आर्थिक विकास और उनकी सत्ता को मजबूत बनाने के लिए महत्वपूर्ण थी।

अलाउद्दीन खिलजी की बाजार नीति :अलाउद्दीन खिलजी ने जनता को राहत पहुंचाने के लिए बाजार नीति को लागू किया था ताकि कोई भी वस्तु उचित मूल्य पर मिल सके। सभी वस्तुओं का कीमत सुल्तान द्वारा तय किया जाता था, कुछ इतिहासकारों का यह कहना है कि यह व्यवस्था केवल दिल्ली में लागू किया गया था। जबकि कुछ इतिहासकार यह कहते हैं कि बाजार नीति पूरे साम्राज्य  में भी लागू किया गया था। बाजार की देख-रेख का कार्य दीवान-ए -रियासत को सौंपा गया था। इस पद पर सुल्तान अपने सबसे विश्वासी व्यक्ति को रखता था। यह लोग सुल्तान के लिए गुप्तचर व्यवस्था के अंतर्गत कार्य करते थे, जैसे कि इनका कार्य होता था बाजार में देख-रेख करना कि कौन सा वस्तु का कीमत अधिक लिया जा रहा है या उनके बटखरे का जांच करता था कि कोई व्यक्ति कम वजन से सामान तो नहीं दे रहा है। इस बाजार में व्यापार करने के लिए पंजीकृत करवाना पड़ता था बिना पंजीकृत के लोग व्यापार नहीं कर सकते थे, लोगों की सुविधा के लिए बाजार को तीन भागों में बांटा गया था।

1. गल्ला बाजार या मंडी:अलाउद्दीन खिलजी के द्वारा स्थापित बाजारों में सबसे मुख्य गल्ला या मंडी बाजार था, सभी केंद्र में गल्ला बाजार होता था। यहां पर अनाज की बिक्री या खरीदी की जाती थी, इस बाजार में सभी अनाजों का कीमत तय किया गया था। जैसे कि गेहूं का मूल्य सात जीतल था यह एक टक्का का 50 वां भाग जीतल होता था। इसी प्रकार चना 5 जीतल इत्यादि सभी वस्तुओं का कीमत सुल्तान द्वारा तय किया गया था। तय किया गया कीमत से अधिक दाम में किसी भी वस्तु को नहीं बेचा जा सकता था यहां पर जो वस्तुओं को कम दाम में लेकर अधिक दाम में बेचता था उन्हें सुल्तान द्वारा कठोर दंड दिया जाता था। यह कहा जाता है कि इस समय एक-दो गोदाम में अनाज हमेशा भरा रहता था ताकि आपातकाल के दौरान उसका प्रयोग किया जा सके।

2. घोड़े, दासो और मवेशियों के बाजार:-अलाउद्दीन खिलजी द्वारा दूसरा प्रकार का बाजार घोड़े, दासो और मवेशियों का बाजार लगाया गया था। यहां पर युद्ध में लड़े जाने वाले घोड़े मिलते थे जो अलग-अलग दामों में बेचा जाता था, वस्तु की कीमत उनके किस्म और नस्ल के आधार तय किया जाता था। सुल्तान के द्वारा घोड़ों के दाम को भी तय किया गया था। सुल्तान ने युद्ध में लड़े जाने वाले घोड़े की कीमत को तीन भागों निश्चित किया था। सबसे अच्छे नस्ल के घोड़े का मूल्य 100 से 120 टंका  था, दूसरे थोड़ा इससे कम अच्छे घोड़े का कीमत 80 से 90 टंका  रखा था। तीसरे किस्म के घोड़े का दाम 60 से 70 टंका  रखा हुआ था। यहां पर पूंजीपतियों और बिचौलियों पर निगरानी रखा जाता था, क्योंकि ये लोग खराब नस्ल के घोड़े को भी कम कीमत में खरीदकर अधिक कीमत में बेचते थे। इसीलिए यहां पर दलालों पर कड़ी निगरानी रखी जाती थी जो धोखाधड़ी करता था उन्हें सुल्तान द्वारा कठोर दंड दिया जाता था। इस प्रकार से इस बाजार में व्यापारियों को निश्चित दाम पर ही घोड़े को बेचने या खरीदने होते थे। इस बाजार में दासो तथा मवेशियों का भी दाम सुल्तान द्वारा निश्चित किया गया था। जैसे कि काम करने वाली दासी का दाम 5 से 12 टंका होता था, जबकि एक सुंदर युवा दास की कीमत 20 से 30 टंका होता था। इसी प्रकार से दुधारू मवेशियों का भी दाम निश्चित किया गया था।

3. सामान्य बाजार:- अलाउद्दीन खिलजी द्वारा तीसरा प्रकार का बाजार लगाया गया था जिन्हें सामान्य बाजार कहा जाता था। सामान्य बाजार पूरे नगर में होते थे इन बाजारों में अधिकतर बिकने वाली वस्तुएं थी, मिठाइयां, सब्जियां, कंघी, रोटियां, चप्पल ,पान ,जूता ,बर्तन इत्यादि  जैसी कई प्रकार के वस्तुएं का बिक्री होती थी। इस बाजार में भी सुल्तान द्वारा सभी वस्तुओं का कीमत निश्चित किया गया था। जो सभी व्यापारियों को वही दाम में वस्तुओं को बेचना और खरीदना पड़ता था, कीमत से अधिक वस्तुओं का दाम लेने पर उन्हें बेईमानी व्यापारी के अंतर्गत कठोर दंड दिया जाता था ताकि वह दोबारा इस प्रकार का गलती ना करें।

निष्कर्ष: अलाउद्दीन खिलजी ने बाजार में मूल्य नियंत्रण लागू किया था। वे सामान्य लोगों के लिए खाद्य पदार्थों के दाम कम करने के लिए प्रयास करते थे। उन्होंने खाद्य पदार्थों के भाव को नियंत्रित करने के लिए कुछ स्थानों पर निर्देश बनाई थी। अलाउद्दीन खिलजी ने सामाजिक न्याय की दृष्टि से भी बाजार नीति बनाई। वे गरीब लोगों के लिए खाद्य पदार्थों के दाम कम करते थे। 

 Q2.अलाउद्दीन खिलजी की दक्षिण नीति का वर्णन करें

Ans- परिचय:- अलाउद्दीन खिलजी भारत के महान शासकों में से एक थे जिन्होंने दक्षिण नीति को अपनाया था। उन्होंने अपनी सत्ता के दौरान दक्षिण भारत में अपनी सत्ता को स्थापित करने के लिए दक्षिण नीति को अपनाया था। अलाउद्दीन खिलजी की दक्षिण नीति का मुख्य उद्देश्य दक्षिण भारत में सत्ता को स्थापित करना था। उन्होंने दक्षिण भारत के स्थानीय शासकों को अपने नियंत्रण में करने के लिए संघर्ष किया। वे दक्षिण भारत में अपनी सत्ता को स्थापित करने के लिए राजनीतिक और आर्थिक उपायों का प्रयोग  करते थे। अलाउद्दीन खिलजी ने दक्षिण भारत में अपनी सत्ता को स्थापित करने के लिए बहुत सारे कदम उठाए। उन्होंने मदुरै राज्य को अपने अधीन कर लिया और कई राज्यों को अपने अधीनता को स्वीकार कराया था। उन्होंने दक्षिण भारत के समृद्ध व्यापार संबंधित केंद्रों को अपने अधीन किया और उन्हें अपनी सत्ता के तहत रखा। अलाउद्दीन खिलजी ने दक्षिण भारत की विविध संस्कृतियों को भी अपनी सत्ता के अधीन रखा था।

अलाउद्दीन खिलजी की दक्षिण नीति: अलाउद्दीन खिलजी ने अपनी दक्षिण नीति द्वारा कई राज्यों को जीता था जो इस प्रकार से हैं। देवगिरी ,तेलंगाना ,होयसल तथा पांडय राज्य  इत्यादि l

1. देवगिरी :-अलाउद्दीन खिलजी सुल्तान बनने के बाद अपनी दक्षिण नीति द्वारा सबसे पहले देवगिरी के राज्य की विजय अभियान बनाया। यहां का राजा रामचंद्र था जिसको अलाउद्दीन खिलजी ने पराजित करके वहां पर अपनी अधीनता को स्वीकार करा लिया था। रामचंद्र ने कुछ दिनों तक भू राजस्व को दिया, उसके बाद राजस्व देना बंद कर दिया। जिसके बाद अलाउद्दीन खिलजी ने अपने सेना के सेनापति मलिक काफूर द्वारा देवगिरी के राज्यपाल युद्ध करने का जिम्मा सौंपा। काफूर के नेतृत्व में इस राज्य पर हमला करके यहां के राजा को पराजित करके धन को भी लूटा था। बाद में यह राज्य को रामचंद्र को दे दिया ,क्योंकि इन्होंने पुनः भू राजस्व देने के लिए तैयार हो गया।

2. तेलंगाना: –तेलंगाना राज्य भी दक्षिण का ही एक राज्य था, यहां पर भी अलाउद्दीन खिलजी ने अपनी अधीनता को स्वीकार कराने के लिए अभियान किया। जिसमें इस अभियान का नेतृत्व करने के लिए मलिक काफूर को दिया, इन्होंने देवगिरि के शासक के सहायता से तेलंगाना राज्य पर युद्ध करना चाहा। लेकिन यह माना जाता है कि तेलंगाना राज्य के शासक ने बिना युद्ध किए ही इनकी अधीनता को स्वीकार कर ली और घोड़े, हाथी, सोने, चांदी, कोहिनूर हीरा इत्यादि मलिक काफूर को दिया।

3. होयसल:इस राज्य के अभियान का नेतृत्व भी मलिक काफूर ने किया। यहां के जो राजा थे बल्लभ ने भी इनकी अधीनता को स्वीकार कर लिया, और प्रतिवर्ष राजस्व देने के लिए तैयार हो गया। बल्लभ ने भी उपहार के रूप में घोड़ा सोना चांदी इत्यादि काफूर को दिया।

4. पाण्डेय राज्य:पाण्डेय राज्य भी दक्षिण का ही एक राज्य था जहां पर  पाण्डेय का शासन व्यवस्था स्थापित था। इस राज्य के अभियान का नेतृत्व भी काफूर ने किया था। यहां का शासक सुंदर पाण्डेय और वीर पाण्डेय  था जिन्होंने इनकी अधीनता को स्वीकार नहीं किया। यह माना जाता है कि इन्हें काफूर द्वारा पराजित नहीं किया जा सका, लेकिन इस राज्य से धन को लूटा गया था। जिसके बाद बल्लभ को अलाउद्दीन ने दिल्ली बुलाकर उन्हें उपहार दिया।

 Q3. अलाउद्दीन खिलजी के प्रशासनिक सुधारों की विवेचना करें।

    अथवा Q.अलाउद्दीन खिलजी के प्रशासनिक सुधारों की समीक्षा करें।

Ans- परिचयअलाउद्दीन खिलजी, दिल्ली सल्तनत के एक प्रसिद्ध शासक थे जो 1296 ई0 से 1316 ई0 तक शासन किया। अलाउद्दीन खिलजी ने दिल्ली सल्तनत में तब्लीगी मिशन की शुरुआत की थी। इस मिशन के माध्यम से उन्होंने असहिष्णुता के विरुद्ध लड़ाई लड़ी और हिन्दू-मुस्लिम संबंधों को सुधारने का प्रयास किया। अलाउद्दीन खिलजी ने दलितों के हकों को सम्मान देने के लिए कानूनी कदम उठाए। वे दलितों को ब्राह्मणों और क्षत्रियों के साथ समानता का दर्जा देने के लिए प्रयास करते रहे। अपने  शासनकाल के दौरान उन्होंने कई प्रशासनिक सुधार किए थे।

अलाउद्दीन खिलजी के प्रशासनिक सुधारों:- 

1.पुलिस व्यवस्था में सुधार:- अलाउद्दीन खिलजी ने अपनी पुलिस बल को मजबूत करने के लिए कई उपाय अपनाए। उन्होंने शहर में अलग-अलग पुलिस थानों को स्थापित किया था और इन थानों को विभिन्न क्षेत्रों में देख – रेख करने की जिम्मेदारी दी गई थी पुलिस विभाग  उन क्षेत्रों पर अपना नियंत्रण रखता था। इससे पुलिस बल के संगठन में सुधार हुआ और इसमें अधिक से अधिक लोगों को भर्ती किया गया। अलाउद्दीन खिलजी ने अपनी सेना का इस्तेमाल करते हुए शहर की सुरक्षा में सुधार किया था। उन्होंने शहर के चारों ओर कई किले बनवाए थे, जो शहर को सुरक्षित रखने में मदद करते थे।

2. न्याय व्यवस्था में सुधार:मुगल साम्राज्य के शासक अलाउद्दीन खिलजी ने न्याय व्यवस्था में कई सुधार किए थे। उन्होंने अपनी सरकार में न्यायपालों की संख्या बढ़ाई और न्याय प्रणाली को समझदारी से चलाने के लिए नए निर्देश जारी किए।  अलाउद्दीन खिलजी ने अपने शासनकाल में न्यायपालों को लोकप्रिय बनाने के लिए कई उपाय किए थे। उन्होंने न्यायपालों को अधिक सुविधाएं दी और उन्हें अधिक वेतन दिया। इसके अलावा, उन्होंने न्यायपालों को शिक्षित और जानकार बनाने के लिए उन्हें न्याय और कानून संबंधी अध्ययन करने के लिए निर्देश भी दिए। अलाउद्दीन खिलजी ने न्याय प्रणाली को भी सुधारा था। उन्होंने न्याय प्रणाली में तीन अदालतों की स्थापना की थी, जो अलग-अलग मुद्दों के अनुसार सुनवाई किया जाता था। उन्होंने यह भी कहा था कि न्यायपालों को न्याय देने के लिए कोई दबाव नहीं था और वे निष्पक्ष तरीके से निर्णय दे सकते थे। इन सुधारों के बाद, अलाउद्दीन खिलजी की शासनकाल में न्याय व्यवस्था में सुधार हुआ।

3.गुप्तचर व्यवस्था:-उन्होंने देश के सुरक्षा और संरक्षण के लिए कई गुप्तचर व्यवस्थाएं रखा था। इस बात पर सुल्तान के सबसे विश्वसनीय व्यक्ति को रखा जाता था जो अपनी जानकारी के आधार पर उन्हें विभिन्न स्थानों में रखी गई  थी। यह गुप्तचर लोग अभिजात और शक्तिशाली व्यक्तियों की गतिविधियों के बारे में सुल्तान को सूचना देते थे। अलादीन खिलजी ने बहुत से जासूस को भी रखे थे जो अखबारों, पत्रों और अन्य संचार माध्यमों से सूचना प्राप्त करते थे। वे उन स्थानों की सभी जानकारी भी देते थे जहां अलादीन खिलजी की आर्थिक और सामाजिक गतिविधियां हो रही होती थी।

4. डाक विभाग: –अलाउद्दीन खिलजी ने साम्राज्य के विभिन्न भागों में संपर्क बनाए रखने के लिए डाक व्यवस्था का प्रबंध किया था ,जिससे किसी भी प्रकार की सूचना सुल्तान को जल्द ही मिल जाता था। उन्होंने एक प्रभावी डाक सेवा का विकास किया था जो उनकी सत्ता को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थी। अलाउद्दीन खिलजी ने डाक सेवा को बढ़ावा देने के लिए कई कदम उठाए थे। उन्होंने दक्षिणी भारत में अलग-अलग डाक चौकी बनवाई थीं। ये चौकी एक दूसरे से दूर दूर फैले थे। ताकि किसी भी क्षेत्र में सुल्तान के विरुद्ध कोई साजिश रचता था तो सुल्तान को बहुत जल्द पता चल जाता था जिससे सुल्तान उसके विरुद्ध में जल्द ही कदम उठाते थे और अपने विद्रोहियों को कुचल देते थे जिससे इनका शासन व्यवस्था पर किसी भी प्रकार की समस्या नहीं होती थी। इस प्रकार से इन्होंने डाक व्यवस्था से अपने साम्राज्य की शक्ति और अधिक बढ़ा ली। इसके अलावा, अलाउद्दीन खिलजी ने अपनी राजधानी दिल्ली से नागौर तक एक सड़क निर्माण करवाई थी जो उनके सैन्य और संचार व्यवस्था को बेहतर बनाने में मदद करती थी।

 Q4.अलाउद्दीन खिलजी की भू राजस्व नीति का वर्णन करें।

Ans- अलाउद्दीन खिलजी की भू राजस्व नीति:-

अलाउद्दीन खिलजी द्वारा अपनाई गई भू-राजस्व नीति का मुख्य लक्ष्य था कि राज्य का समृद्धि बढ़ाया जाए ताकि उसकी आर्थिक स्थिति मजबूत हो सके। उन्होंने अपनी भू-राजस्व नीति के तहत निम्नलिखित कदम उठाए:

कर वसूली: अलाउद्दीन खिलजी ने बड़े नगरों में टैक्स वसूली करने का विशेष ध्यान दिया। इसके लिए इसने कुल भूमि को पता किया,ताकि उसके अनुसार कर लिया जाए।  वह राज्य के आय को बढ़ाने में सफल रहे। अलाउद्दीन खिलजी ने अपनी कर नीति को बदल दिया था। वह अधिक कर नहीं वसूलते थे और उनका मुख्य उद्देश था कि जनता के प्रति अनुकूलता रहना चाहिए। उन्होंने उत्पादों पर कर लगाने की बजाय उत्पादकों से जो आमदनी  होती थी उसमें से कुछ भाग वसूली की जाती थी।

ज़मींदारी व्यवस्था: अलाउद्दीन खिलजी ने भूमि के स्वामित्व के लिए ज़मींदारी व्यवस्था को प्रचलित किया। यह उनकी नीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था जो उन्होंने व्यापक रूप से लागू किया था। ताकि उन्हें भू राजस्व में लाभ मिल सके। 

भूमि का विकास: उन्होंने राज्य के भूमि के विकास को बढ़ावा दिया। उन्होंने बंदरगाहों, नदी तटों और समुद्र तटों के साथ-साथ, नये कृषि भूमि के लिए कृषि योग्य भूमि को बनाने का प्रयास किया, ताकि नए क्षेत्रों में भी आसानी से कृषि किया जा सके जिससे भू- राजस्व  में वृद्धि हो। 

भूमि का अधिग्रहण: अलाउद्दीन खिलजी ने अधिक से अधिक भूमि को अपने अंतर्गत करने के लिए भूमि अधिग्रहण की नीति को अपनाया। इसके लिए उन्होंने लोगों को अपने स्वामित्व में आने के लिए उन्हें छोटे-छोटे उपहार देते थे। ताकि रैयत या किसान उनके अंतर्गत कार्य करें जिससे इन्हें भू राजस्व में लाभ प्राप्त हो। अलाउद्दीन खिलजी ने अपनी राज्य के विभिन्न हिस्सों में भूमि का अधिग्रहण किया था। वह निजी व्यवसायियों को भूमि का दान नहीं देते थे और भूमि को सीधे राज्य से संबंधित किया गया था। इससे उन्हें राज्य का अधिक नियंत्रण मिलता था और जमीदार, रैयत, किसान सभी इनके अधीन कार्य करते थे।

लगातार जमीन का नापना: उन्होंने राज्य के सभी क्षेत्रों में जमीन का नापना शुरू किया। इससे राज्य सरकार को सही भूमि राजस्व जानने में मदद मिली। क्योंकि जब राज्य सरकार को पता नहीं था कि उनके अंतर्गत कितना भूमि है तो उन्हें उचित भू राजस्व राजस्व नहीं मिल पाता था। जमीन के नपाई होने से भू राजस्व में वृद्धि हुईं।

सैन्य शक्ति को बढ़ाने के लिए प्रोत्साहन देना: अलाउद्दीन खिलजी भारत के एक प्रमुख शासक थे, जो दिल्ली सल्तनत का शासक थे। वह भूमि राजस्व नीति को बदलने के लिए प्रस्ताव लाया था। उनका मुख्य उद्देश्य भूमि राजस्व को बढ़ावा देना था ताकि उन्हें अपने सैन्य विकास के लिए प्रत्येक वर्ष  बड़ी मात्रा में वित्तीय सहायता  मिल सके।

 Q5. अलाउद्दीन खिलजी के आर्थिक सुधारों का वर्णन करें।

 Ans- परिचय:- अलाउद्दीन खिलजी भारत के सल्तनतकार थे और उनकी शासनकाल 1296 से 1316 तक चला। उनकी भू-राजस्व  नीति उनके राज्य की आर्थिक विकास और उनकी सत्ता को मजबूत बनाने के लिए महत्वपूर्ण थी। अलाउद्दीन खिलजी ने स्थानीय उत्पादों को प्रोत्साहित करने के लिए भी कदम उठाए। वे ज्यादातर लोगों को खेती व व्यापार में लगने के लिए प्रोत्साहित किए। इससे स्थानीय उत्पादों का निर्माण बढ़ा और विदेशी उत्पादों के प्रवाह को रोका गया। 

अलाउद्दीन खिलजी के आर्थिक सुधार: अलाउद्दीन खिलजी दिल्ली सल्तनत के तीसरे सुल्तान थे। उन्होंने अपने शासनकाल में कई आर्थिक सुधार किए।

1. कृषि का उत्पादन के लिए कदम उठाना: –अलाउद्दीन खिलजी ने कृषि उत्पादन को बढ़ाने के लिए कई कदम उठाए। उन्होंने किसानों को भूमि देने के लिए नए कानून बनाए और किसानों को भूमि दिया गया। ताकि हर किसान कृषि कर सके, साथ ही उन्होंने  कृषि उपकरणों को किसानों तक पहुंचाने के लिए उन्हें कुछ आर्थिक सहायता भी किया। फसल के लिए नए बीजों को लाया। नहर और तालाबों के पास कृषि योग्य भूमि को बनाया गया, इससे कृषि उत्पादन में वृद्धि हुई जिससे खाद्य संसाधनों की आपूर्ति बढ़ी। जब खाद्य संसाधनों में वृद्धि हुई तो विदेशों पर कम निर्भर रहने लगा, क्योंकि जब खाद संसाधन की वृद्धि नहीं थी तब विदेशों से व्यापार किया जाता था। उन पर ही निर्भर रहना पड़ता था।

2. व्यापार के विकास को प्रोत्साहन देना:- अलाउद्दीन खिलजी ने व्यापार के विकास को भी प्रोत्साहित किया। उन्होंने दक्षिणी भारत में निर्मित वस्तुओं को उत्तरी भारत में बेचने के लिए राजमार्ग निर्माण किया। यानी कि पहले एक स्थान से दूसरे स्थान जाने के लिए अच्छे रास्ते नहीं थे ,जिससे लोग व्यापार कर सके इसी को ध्यान में रखते हुए अलाउद्दीन खिलजी ने मार्ग का निर्माण किया जिससे व्यापार के विकास में प्रोत्साहन मिला। इससे दक्षिणी भारत से वस्तुओं की आपूर्ति बढ़ी और व्यापार में वृद्धि हुई।

3.वित्तीय सुधार:-अलाउद्दीन खिलजी ने वित्तीय सुधार भी किए। वित्तीय सुधार करने के लिए उन्होंने सोने और चांदी के सिक्कों का निर्माण किया। जो व्यापार में बड़ी सहायता प्रदान करते थे। इसके अलावा उन्होंने नए टैक्स नियम बनाए, जिससे वित्तीय सुधार किया जा सके इस प्रकार से इन्होंने वित्तीय क्षेत्रों में भी सुधार किया।

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