संगम काल में साहित्य के विकास

Q.संगम काल में साहित्य के विकास पर प्रकाश डालें।      

  अथवा Q.संगम युग के समाज एवं संस्कृति पर प्रकाश डालें।                            

Ans- परिचय :- प्राचीन संगम काल में  जिन ग्रंथों  की रचनाएं की गई उन्हें संगम साहित्य कहा गया है। संगम युग की अवधि लगभग 300 ईसा पूर्व से लेकर 300 ई. के बीच मानी जाती है । संगम का अर्थ संघ होता है जिसके अंतर्गत तमिल विद्वानों ,कवियों ,तथा बुद्धिजीवियों का एक समूह था। जो कि प्रमुख राजाओं के संरक्षण में ही आयोजित होती थी। 

 संगम साहित्य या संगम युग:-  संगम साहित्य मुख्य रूप से तमिल भाषा में लिखा गया है । तमिल भाषा में लिखे गए साहित्य को ही संगम साहित्य या संगम युग कहा गया है। इस साहित्य में कृष्णा एवं तुंगभद्रा नदी के दक्षिण भारत में बसे तमिलों के बारे में वर्णन किया गया है। आठवीं सदी ई. में तीन संगमो का वर्णन मिलता है  ,इस युग की प्रमुख साहित्य रचनाओं में  तोलकाप्पियम्, ग्रंथ तथा शिलप्पादिकारम्, मणिमेखलै और जीवक चिंतामणि महाकाव्य शामिल हैं। इन संगमो प्रदेशों के विकास में चेर, पांडव, तथा चोल राजाओं का योगदान माना जाता है। इसकी जानकारी हमें अशोक के अभिलेखों से मिलती है। इसके अलावा कलिंग के खारवेल के हाथीगुम्फा शिलालेख में तमिल राज्यों का उल्लेख है।   

 

  प्रथम संगम :

• प्रथम संगम मदुरै में आयोजित किया गया था। इस संगम में देवता और महान संतशामिल थे। परंतु इस संगम का कोई साहित्यक ग्रंथ उपलब्ध नहीं है। इसकी अध्यक्षताा अगस्त्य ने की थी। इस संघ में कुल 549 सदस्य सम्मिलित हुये थे। जिसमें 4499 लेखकों अपनी रचनाएं प्रकाशित करने का अनुमति दी गई थी। यह संगम में पांडव वंश के 89 राजाओं का  संरक्षण प्राप्त था लेकिन मदुरै समुद्र में समा जाने के कारण प्रथम संगम काल की समाप्ति हो जाती है।  

 

 द्वितीय संगम :- द्वितीय संगम कपाटपुरम् में आयोजित किया गया था‌ इस संगम का तोलकाप्पियम्  नामक एकमात्र ग्रंथ  उपलब्ध है। जो तमिल व्याकरण ग्रंथ है। इसमें 59 पांडव शासकों का संरक्षण प्राप्त था इस संगम में तमिल भाषा के 49 विद्वानों ने भाग लिया था। तथा 3700 कवियों द्वारा प्रकाशित करने की अनुमति दी गयी थी।  

 

तृतीय संगम:-  तृतीय संगम भी मदुरै में हुआ था इसमें  49 विद्वानों ने भाग लिया था। इस संगम में 49 पांडव शासकों का संरक्षण प्राप्त था। इसको तैयार करने के लिए लगभग 449 कवियों को अनुमति दिया गया था ।

 

संगमकालीन प्रशासन व्यवस्था :- संगम कालीन राज्यों की शासन व्यवस्था राजतंत्र एवं वंशानुगत था । राजा शासन का सर्वोच्च अधिकारी था और सभी प्रकार की शक्तियां उसी के हाथों में नहीं थी। संगम युग के प्रत्येक राजवंश के पास शाही प्रत्येक था ।जैसे चोलो  के लिए बाल , पांडवों के लिए मछली , तथा चेरो के लिए धनुष। राजा की शक्ति पर पांच परिषदों का नियंत्रण था जिन्हें पांच महासभाओं के नाम से जाना जाता है। जैसे मंत्री ,पुरोहित , दूत, सेनापति, तथा गुप्तचर व्यवस्था था। सैन्य प्रशासन का नियंत्रण कुशलतापूर्वक किया जाता था प्रत्येक शासक के पास एक नियमित सेना जुड़ी हुई थी। 

• उस समय शाही दरबार राजा के राजनीतिक क्रियाओं का केंद्र होता था। जिसमें शाही दरबार के सदस्य राजा और उसके साथ रानी भी मौजूद होती थी। इस युग में राजा निरंकुश होता था जिसके कारण उसकी शक्तियों को रोका नहीं जा सकता था।

 

सामाजिक जीवन:-पुरुनानरु नामक ग्रंथ से तमिलों के सामाजिक जीवन के बारे में पता चलता है की संगम समाज चार वर्गों में विभक्त था। संगम समाज में पुजारियों तथा ब्राह्मणों की प्रधानता थी। यहां पर ब्राह्मण लोग या तो पुजारी थे या विद्वान थे। जो राजा के लिए ज्योतिषी या न्यायाधीश के कार्य करते थे। समाज में इनका आदर व सम्मान होता था।यहां पर क्षत्रिय वैश्य और शुद्र के बारे में कोई जानकारी नहीं मिला है यानी समाज में दास प्रथा नहीं था।

 

 संगम युग के दौरान स्त्रियों की स्थिति:- संगम युग के दौरान स्त्रियों की स्थिति ठीक थी महिलाओं का सम्मान किया जाता था। विवाहित स्त्रियां घर के कामकाज करती थी तथा अपने बच्चों व पतियों की देखभाल करती थी। महिलाओं को संपत्ति का अधिकार नहीं था। इन्हें अपना जीवनसाथी चुनने का अनुमति थी।लेकिन यहां पर विधवाओं का जीवन बहुत ही कठिन होता था समाज में इन्हें अलग नजरों से देखा जाता था। इस समाज में उच्च स्तर पर सती प्रथा के प्रचलन का उल्लेख मिलता है।समाज में साधारण पुरुष एक विवाह तथा राजा बहु -विवाह करते थे । 

 

 धार्मिक जीवन:- संगम काल के प्रमुख देवता मुरुगन थे, जिन्हें तमिल भगवान के रूप में जाना जाता है।दक्षिण भारत में मुरुगन की पूजा सबसे प्राचीन मानी जाती है और भगवान मुरुगन से संबंधित त्योहारों का संगम साहित्य में उल्लेख किया गया था।  संगम काल के दौरान पूजे जाने वाले अन्य देवता मयोन (विष्णु), वंदन (इंद्र), और कृष्ण, थे।संगम युग में बौद्ध धर्म और जैन धर्म का भी प्रसार दिखाई पड़ता है।

 

आर्थिक जीवन:-संगम काल साहित्य से यह पता चलता है कि दक्षिण भारत की भूमि उपजाऊ थी जिसके कारण यहां पर अधिक अनाज पैदा होता था। चेर राज्य कटहल ,काली मिर्च ,और हल्दी की खेती के लिए प्रसिद्ध था। चोल राज्य में कावेरी नदी से सिंचाई किया जाता था यह लोग गन्ना से शक्कर बनाते थे। कृषि मुख्य व्यवसाय था और चावल सबसे आम फसल थी। संगम युग की महत्त्वपूर्ण विशेषता इसका आंतरिक और विदेशो में भी व्यापार था। बड़े बंदरगाहहो वाले नगर व्यापार का केंद्र होता था।  

• संगम युग के प्रमुख निर्यात में सूती कपड़े और मसाले जैसे- काली मिर्च, अदरक, इलायची, दालचीनी और हल्दी के साथ-साथ हाथी दाँत के उत्पाद, मोती और बहुमूल्य रत्न आदि प्रमुख थे।

 

15 Most objective qeastion

 

 Q1.’लाल चेर’ के नाम से प्रसिद्ध वह चेर शासक कौन था, जिसने कणगी (पत्तिनी) के मंदिर का निर्माण कराया था ।

Ans- शेनगुट्टवन

Q2.तमिल का गौरवग्रंथ ‘जीवक चिन्तामणि’ किससे संबंधित है?

Ans -जैन धर्म से

Q3.तमिल भाषा के ‘शिल्पादिकारम्’ और ‘मणिमेखलई’ नामक गौरवग्रंथ किससे संबंधित है?

 Ans -बौद्ध धर्म

Q4.निम्न में कौन संगमयुगीन व्याकरण रचना सर्वाधिक महत्वपूर्ण रचना मानी गयी ।

Ans- तोलकापियम्

Q5. ’तोलक्कप्पियम्’ ग्रंथ संबंधित है।

Ans -व्याकरण और काव्य से

Q8.धार्मिक कविताओं का संकलन ‘कुरल’ किस भाषा में है?

Ans- तमिल

Q9.पुहर कावेरीपट्टनम की स्थापना किसने की ?

Ans -कारिकाल

 Q10. संगम काल के अंतर्गत कौन कौन से राज्य आते है? 
 Ans- चेर, चोल और पांड्य
 
Q11 .तमिलों के सबसे प्राचीन देवता कौन है?  
Ans-मुरुगन
 
 Q12. मेगस्थनीज ने अपनी पुस्तक इंडिका में किस संगम कालीन राज्य का वर्णन किया है?
Ans -पांड्य का
 

Q13. तोल्लकपिय्यम की रचना किसने की?  

Ans -तोल्लकपिय्यर ने
                                          
Q15. संगम कालीन किन शासकों का व्यापार रोमन साम्राज्य के साथ होता था?  
Ans- चेर शासको का
 

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